ऐसा लगता है राज से कोई राक्षस कह रहा है ठोक रे, बिना सोचे समझे ठोकता जा। दांए बांए मत देख बस ऑंख बंद करके ठोकता जा। यह देखने की कतई ज़रूरत नहीं है कि सामने कौन है बस इतना याद रख मराठों भर को छोड़ना है उनके नाम की आड़ लेकर मेरी बात मानकर ठोकता जा। बड़ा मजा आता है मारकाट में हाथपैर टूटे खून बहते लोगों को देखकर जो आनंद आता है उसका सिर्फ महसूस ही किया जा सकाता बयान नहीं । शायद इसी कारण राज ठाकरे ने मारधाड़ शुरू कर दी है। उसने राजदंड की प्राप्ति के पहले ही डंडे को धारण कर लिया है। शायद वह सोच रहा हो डंडा भी तो राजदंड का वंशज है और वह उसे राजदंड की प्राप्ति तक पहुँचा दे!
राजनीति का अर्थ ही है जैसे मिले राज वही नीति अपनाना चाहिए। राजनीति में सिध्दांत न्याय व नीति का कोई काम नहीं क्यों कि इनसे 'राज' प्राप्ति कठिन ही नहीं नामुमकिन है। प्रजातंत्र में जनता तो भेड़ बकरी होती है उसे हांक कर ही राज प्राप्ति हो सकती है और हांकने की क्रिया को अंजाम देने के लिए डंडा जरूरी है। हो सकता है 'डंडे' को खुश करके उसके दादाजी (राजदंड) खुश हो जायें और सत्ता हाथ आ जाये। 'राज' भी राज करने का यह दर्शन केवल समझ ही नहीं वरन आत्मसात कर चुके हैं।
''राज ठोक रे'' यह किसी का नाम नहीं बल्कि राज करने या सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने की सीढ़ी है अर्थात् अगर राज करना है या राज पाना है तो ठोकना जरूरी है। हल्ला करना, हल्ला बोलना सत्ताा पाने के मंत्र हैं। चाण्ाक्य साम, दाम, दंड, भेद सभी का इस्तेमाल करता था। अपना काम निकालने के लिए या यों कहें कि ये चारों सत्ता सिंहासन के चार पाए हैं जिससे सत्ता का सिंहासन पाना, बचाए रखना सरल एवं संभव होता है। कोई चाण्क्य ही उपरोक्त चारों को कुशलता पूर्वक काम में ला सकता है पर एक लाठी से हांकना सरल काम है। डंडा और राजदंड का चोर पुलिस का संबंध है। यह एक अजमाया हुआ शार्टकट है। कुछ उभरते नेता इस पर गहरी आस्था रखते हैं और बिना दांए बांए देखे इस पर निष्ठापूर्वक अमल करते हैं। प्रजातंत्र का तो यह सबसे मजबूत पाया है।
प्रजातंत्र में शासन के लिए बहुमत जरूरी होता है। अरस्तु कहता हैं बहुमत मूर्खो का होता है। इस हिसाब से ठोकने के महामंत्र को जपकर ही चलाया जा सकता है। मूर्खो को अपनी बात समझाने या कहें मानवाने के लिए ठोकना सबसे कारगर फार्मूला पाया गया है जिसकी लाठी है भैंस उसी कि मानी जाती है। तर्कशास्त्र का सिध्दांत भी है हाथ टेबिल को छू रहा है और टेबल जमीन को इस प्रकार यह मान लो हाथ टेबल को छू रहा है। इस हिसाब से जिसकी लाठी है भैंस उसी की माना जाना चाहिए।
प्रजातंत्र में जनता गूँगी, बहरी और सोती रहती है इसे जगाने के लिए डंडे की भाषा ही ठीक है। वैसे भी सोते हुए को जगाने के लिए हम उसे हिलाते हैं चिल्लाते हैं कभी - कभी पानी भी उसके मुँह पर मारते हैं। यह तो एक आदमी को जगाने के लिए है पर जब जनसाधारण को जगाना हो तो डंडे की ही जरूरत होती है।
''कहीं जला के राख न कर दे सूरज की तपिश,
आस्मां नींद में है इसके मुँह पर समंदर मारो।''
याने एक आदमी को जगाने के लिए एक चुल्लू पानी लगता है तो जनता को जगाने को समंदर याने डंडे की ही जरूरत होगी।
अब हमें सोचना यह है कि डंडा चलाकर हम अपनी किस बात को समझना चाहते हैं। किसी भी राजप्राप्ति के सिध्दांत की दुम ''अपना उल्लू'' पकड़े रहता है। सिध्दांत तो ऊपर जसा दिसते तसा नसते अर्थात जैसा दिखता है वैसा सच में होता नहीं। राज ठोकरे नए - नए नेता बने हैं या बनना चाहते हैं इसलिए अपनी उम्मीदवारी का एलान वे डंडे की भाषा से कर रहे हैं ताकि कोई सोने न पाए और जो सोए हैं वे जाग जायें। वे सत्ता पाना चाहते हैं यह भाषणबाज़ी से पाने में काफी समय लगेगा और क्या भरोसा कोई सुनता है या नहीं । अत: एक डंडा जमाओ और आदमी (जो डंडा खा चुका है) आपकी बात तुरंत समझ जायेगा। बचपन में हमने अपने गुरूजी से सुना था छड़ी पड़े छमाछम विद्या आए धमाधम। हमें विद्या ऐसे ही आई है।
कभी - कभी बिना वाजिब मुद्दे के राजनीति के अखाड़े में खड़ा होना आसान नहीं होता और गैरवाज़िब मुद्दे को मनवाने के लिए आचार्य डंडा प्रसाद जी को सर्वश्रेष्ठ गुरू सर्वसम्मति से माना जाता है। बाकि पार्टियाँ पहले से ही कुछ मुद्दों की पूँछ चुनाव की बैतरणी पार करने के लिए पकड़े खड़ी हैं करीब - करीब सभी सतही तौर पर ठीक ठाक लगने वाले मुद्दे खत्म हो चुके हैं भाजपा हिंदुत्व की कांग्रेस सर्वधर्म समानता समाजवादी पार्टी समाजवाद की और बाकी पार्टियों राष्ट्रीयता, धर्मनिर्पेक्षता, अपने क्षेत्रीय मुद्दों को अपने बैनरों में चस्पा कर चुकी है। अब ऐसी हालत में एक नया वाजिब सा दिखने वाला मुद्दा ढूँढना कठिन है सो राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र का मुद्दा चलाने की थोड़ी बहुत गुंजाइश है। राज शायद पूरे राष्ट्र को धृतराष्ट्र समझ रहे हैं। उनके गुंडों की भीड़ में उन्हें इंच भर आगे का नहीं दिख रहा। 'महाराष्ट्र मराठों के लिए' मुद्दा उनके लिए शेर की सवारी है जिस पर एक बार चढ़ा तो जा सकता है पर उससे उतरा नहीं जा सकता वरना शेर खा जायेगा।
सभी समय एकसा नहीं होता । देश के बाकी अवसर वादी नेता राज को भला एक नया मुद्दा खड़ा करने देंगे ? अपना एक और प्रतिद्वंदी बढ़ने देंगे वे सब मिलकर राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र नहीं है समझाएंगे। इसमें दम भी है आखिर प्रजातंत्र में बहुमत की चलती है और बहुमत राज के खिलाफ है। राज की खून खराबे की नीति कहीं उन्ही ही भारी न पडे। राज ठोक रे की जगह अगर 'राज को ठोकरे' आवाज बुलंद हुई तो राज के आज, कल, परसों सभी खतरे में पड़ जायेंगे।
राजनीति का अर्थ ही है जैसे मिले राज वही नीति अपनाना चाहिए। राजनीति में सिध्दांत न्याय व नीति का कोई काम नहीं क्यों कि इनसे 'राज' प्राप्ति कठिन ही नहीं नामुमकिन है। प्रजातंत्र में जनता तो भेड़ बकरी होती है उसे हांक कर ही राज प्राप्ति हो सकती है और हांकने की क्रिया को अंजाम देने के लिए डंडा जरूरी है। हो सकता है 'डंडे' को खुश करके उसके दादाजी (राजदंड) खुश हो जायें और सत्ता हाथ आ जाये। 'राज' भी राज करने का यह दर्शन केवल समझ ही नहीं वरन आत्मसात कर चुके हैं।
''राज ठोक रे'' यह किसी का नाम नहीं बल्कि राज करने या सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने की सीढ़ी है अर्थात् अगर राज करना है या राज पाना है तो ठोकना जरूरी है। हल्ला करना, हल्ला बोलना सत्ताा पाने के मंत्र हैं। चाण्ाक्य साम, दाम, दंड, भेद सभी का इस्तेमाल करता था। अपना काम निकालने के लिए या यों कहें कि ये चारों सत्ता सिंहासन के चार पाए हैं जिससे सत्ता का सिंहासन पाना, बचाए रखना सरल एवं संभव होता है। कोई चाण्क्य ही उपरोक्त चारों को कुशलता पूर्वक काम में ला सकता है पर एक लाठी से हांकना सरल काम है। डंडा और राजदंड का चोर पुलिस का संबंध है। यह एक अजमाया हुआ शार्टकट है। कुछ उभरते नेता इस पर गहरी आस्था रखते हैं और बिना दांए बांए देखे इस पर निष्ठापूर्वक अमल करते हैं। प्रजातंत्र का तो यह सबसे मजबूत पाया है।
प्रजातंत्र में शासन के लिए बहुमत जरूरी होता है। अरस्तु कहता हैं बहुमत मूर्खो का होता है। इस हिसाब से ठोकने के महामंत्र को जपकर ही चलाया जा सकता है। मूर्खो को अपनी बात समझाने या कहें मानवाने के लिए ठोकना सबसे कारगर फार्मूला पाया गया है जिसकी लाठी है भैंस उसी कि मानी जाती है। तर्कशास्त्र का सिध्दांत भी है हाथ टेबिल को छू रहा है और टेबल जमीन को इस प्रकार यह मान लो हाथ टेबल को छू रहा है। इस हिसाब से जिसकी लाठी है भैंस उसी की माना जाना चाहिए।
प्रजातंत्र में जनता गूँगी, बहरी और सोती रहती है इसे जगाने के लिए डंडे की भाषा ही ठीक है। वैसे भी सोते हुए को जगाने के लिए हम उसे हिलाते हैं चिल्लाते हैं कभी - कभी पानी भी उसके मुँह पर मारते हैं। यह तो एक आदमी को जगाने के लिए है पर जब जनसाधारण को जगाना हो तो डंडे की ही जरूरत होती है।
''कहीं जला के राख न कर दे सूरज की तपिश,
आस्मां नींद में है इसके मुँह पर समंदर मारो।''
याने एक आदमी को जगाने के लिए एक चुल्लू पानी लगता है तो जनता को जगाने को समंदर याने डंडे की ही जरूरत होगी।
अब हमें सोचना यह है कि डंडा चलाकर हम अपनी किस बात को समझना चाहते हैं। किसी भी राजप्राप्ति के सिध्दांत की दुम ''अपना उल्लू'' पकड़े रहता है। सिध्दांत तो ऊपर जसा दिसते तसा नसते अर्थात जैसा दिखता है वैसा सच में होता नहीं। राज ठोकरे नए - नए नेता बने हैं या बनना चाहते हैं इसलिए अपनी उम्मीदवारी का एलान वे डंडे की भाषा से कर रहे हैं ताकि कोई सोने न पाए और जो सोए हैं वे जाग जायें। वे सत्ता पाना चाहते हैं यह भाषणबाज़ी से पाने में काफी समय लगेगा और क्या भरोसा कोई सुनता है या नहीं । अत: एक डंडा जमाओ और आदमी (जो डंडा खा चुका है) आपकी बात तुरंत समझ जायेगा। बचपन में हमने अपने गुरूजी से सुना था छड़ी पड़े छमाछम विद्या आए धमाधम। हमें विद्या ऐसे ही आई है।
कभी - कभी बिना वाजिब मुद्दे के राजनीति के अखाड़े में खड़ा होना आसान नहीं होता और गैरवाज़िब मुद्दे को मनवाने के लिए आचार्य डंडा प्रसाद जी को सर्वश्रेष्ठ गुरू सर्वसम्मति से माना जाता है। बाकि पार्टियाँ पहले से ही कुछ मुद्दों की पूँछ चुनाव की बैतरणी पार करने के लिए पकड़े खड़ी हैं करीब - करीब सभी सतही तौर पर ठीक ठाक लगने वाले मुद्दे खत्म हो चुके हैं भाजपा हिंदुत्व की कांग्रेस सर्वधर्म समानता समाजवादी पार्टी समाजवाद की और बाकी पार्टियों राष्ट्रीयता, धर्मनिर्पेक्षता, अपने क्षेत्रीय मुद्दों को अपने बैनरों में चस्पा कर चुकी है। अब ऐसी हालत में एक नया वाजिब सा दिखने वाला मुद्दा ढूँढना कठिन है सो राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र का मुद्दा चलाने की थोड़ी बहुत गुंजाइश है। राज शायद पूरे राष्ट्र को धृतराष्ट्र समझ रहे हैं। उनके गुंडों की भीड़ में उन्हें इंच भर आगे का नहीं दिख रहा। 'महाराष्ट्र मराठों के लिए' मुद्दा उनके लिए शेर की सवारी है जिस पर एक बार चढ़ा तो जा सकता है पर उससे उतरा नहीं जा सकता वरना शेर खा जायेगा।
सभी समय एकसा नहीं होता । देश के बाकी अवसर वादी नेता राज को भला एक नया मुद्दा खड़ा करने देंगे ? अपना एक और प्रतिद्वंदी बढ़ने देंगे वे सब मिलकर राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र नहीं है समझाएंगे। इसमें दम भी है आखिर प्रजातंत्र में बहुमत की चलती है और बहुमत राज के खिलाफ है। राज की खून खराबे की नीति कहीं उन्ही ही भारी न पडे। राज ठोक रे की जगह अगर 'राज को ठोकरे' आवाज बुलंद हुई तो राज के आज, कल, परसों सभी खतरे में पड़ जायेंगे।
श्रीमती आशा श्रीवास्तव
आर.डी.ए. कॉलोनी
टिकरापारा, रायपुर
प्लाट नं. : 45
फोन नं. : 0771-2273934
मो.नं. : 094076-24988


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