Thursday, October 15, 2009

अजय जी चिट्ठाजगत में आगमन की बधाई

अजय त्रिपाठी जी आपका ब्‍लॉग की दुनिया में बहुत-बहुत स्‍वागत है।


उम्‍मीद है कि अजय वार्ता की गूंज बहुत दूर तक जाएगी। आपकी बौद्धिक और संगठनिक क्षमता का प्रतिदिम्‍ब अजय वार्ता ब्‍लॉग होगा।


धनतेरस के दिन सभी धन वर्षा की कामना करते हैं।
धनतेरस के दिन तरह-तरह की खरीदी और पूजा की जाती है।
आपका यह इंटरनेट दीपदान आपको सर्ववर्षा देने की कामना है।

Thursday, April 23, 2009

गीत लिखती किसलिए

गीत लिखती किसलिए मैं ।
मनपटल पर भाव आते,
हाथ मेरे रूक न पाते ।
शब्द कागज पर उतरते,
और तभी विश्राम पाते,
पीर मनकी ढालना है, गीत लिखती इसलिए ॥

बात कुछ ऐसी जहाँ की,
कह सपूँ ये कामना है,
जिसकी चर्चा भी किसी से
और कभी करना मना है,
गाँठ मनकी खोलना है गीत लिखती इसलिए ॥

गीत फूलों जैसे महकें,
ओस की ठंडक से सिहरें
बनके बरखा रसभिगोदें
लहर बनके तटको छूले,
प्रकृति के संग झूमना है, गीत लिखती इसलिए ॥

प्रेम की महिमा लिखूँ मैं,
छींट कर खुशबू के छींटे
मधुरिमा इसकी लिखूँ मैं,
प्रेमरस में पागना है गीत लिखती इसलिए ॥

मनके दर्पण क्यों है मैले
क्यों समर्पण भी कसैले,
जिस तरफ नजरें उठाउँ,
इनके घूँघट खोलना है, गीत लिखती इसलिए ॥

व्यस्त मेजों को लिख्रू मैं,
मस्त सेजों को लिखूं मैं,
त्रस्त मानवता लिखूं मैं,
ध्वस्त नैतिकता लिखूँ मैं,
दीप सच के बालना है, गीत लिखती इसलिए ॥

आशा श्रीवास्‍तव

Saturday, February 14, 2009

Interview of Asha Shrivastava



Interview of Asha Shrivastava in Harshavardhan Jayanti in Allahabad

Rally of Harshavardhan Jayanti



Rally of Harshavardhan Jayanti at Allahabad

Giving Certificate to Asha Shrivastava and other Guest



Giving Certificate to Asha Shrivastava and other Guest in Harshavardhan Jayanti at Allahabad

Asha Shrivastava Book Vimochan

पाकिस्तान / विनाशिस्तान

कठोर तपस्या से भसमासूर ने वरदान पाया कि वह जिसके सिरपर हाथ रखदेगा वह मर जायेगा। 86 से पाकिस्तान में आतंकवादिय तैयार करने का काम बकायदा चल रहा है। इसे भसमासूर की तपस्या वाला समय कहा जा सकता है। अब वह पूरी तरह विनाश के सारे हथियारों से लैस भस्मासूर बन गया और विश्‍व के देशों के पीछे उनके सिरपर हाथ रखने की खुल्लम-खुल्ला धमकी दे रहा है समय को इंतजार है। विष्णु के मोहिनी रूप का ताकि भस्मासूर को उसी के सीरपर हाथ रखने की स्थितियाँ पैदा हो जाय। विश्‍व जनमत धीरे-धीरे मोहिनी रूप धारण करता जा रहा है। हमें इंतजार है उस पल का जब अपनी ही नासमझी से भसमासूर अपने सिरपर हाथ रखता है।

कल तक ताज और आज ?

ताज सिर पर तभी बना रह सकता है जब तक वह जन कल्याण की राह चलता है। उसकी चाल खराब होने लगे तों यह स्थित बहुत दिन नहीं चलपाती और पैर का जूता पैर से निकल पड़ने को बेचैन हो जाता है और साथ ही वह हाथ को भी पटा लेता है उसे उठा लेने के लिए और चल पड़ता है हाथ ताज को सबक सिखाने। ताज मनमानी करने वाले सिर पर नहीं रहना चाहता उसे वहॉ रहने भी नहीं दिया जाता। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जार्ज बुश का ताज है से एक साधारण से आदमी के साधारण से जूते के जरिए उसकी औकत दिखा दी गई।

टेस्ट टयूब बेबी

क्ल टी. व्ही. पर एक टेस्टटयूब बेबी का जिक्र देखने को मिला जिसने इस बात को उजागर किया कि लकीर को फकीरी व्यस्था के चलते उससे बच्चे के दाखिले के वक्त पिता का नाम बताने को कहा और असे दाखिले की आवष्यक शर्त कहकर लौटा दिया टेस्ट टयूब गेगी की माँ बच्चे के पिता का नाम क्या बतांए? जब वह खुद नहीं जानती इस पर उस पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया गया। कानून जब बना था तब टेस्टटयूब बेबी नहीं हुआ करते थे पर अब तो होते हैं ऐसे केस बहुत कम हैं इसलिए इनके लिए कानून बनेगा ऐसी उम्मीद बेकार है। भ्रष्ट न्यायालो में सीधे इस केस की फेसला कठिन है फिर इस लीक से हटे केस का क्या होगा। कहा नहीं जा सकता। जन्म सार्टि फिकर न होने से आगे नौकरियाँ, विदेश जाने के लिए पासपोर्ट वीजा कैसे मिल सकते हैं। जायदाद में हिस्सा भी टेस्ट टयूब बेबी को मिलना एक समस्या है। हमारे सामने यह समस्याहै और इसका कोई न कोई समाधान सोचना ही होगा।

Thursday, January 1, 2009

New Year Greetings

“New Year may bring you shower of flower
And Saved Songs from mango bowers.”


Wish you a Happy New Year

Asha Shrivastava
R.D.A. Colony, Plot No. 45, Tikrapara
Raipur (C.G.)
0771-2273934
094076-24988

Thursday, December 18, 2008

गुरू वंदना

हे सुधासिंधु हे ज्ञानपुंज,
तुम तभ को हरते हवन कूंड
है चित्र रहित मेरा मन पटल,
बन तू ही तूलिका रंग नवल
हे दिशा ज्ञान हे दीप पुँज ।

रवि जहाँ जाने से डरता,
तू निर्भीक वहीं पग धरता,
हे ब्रम्हरूप की एक बूंद ।

मेरी जरा थाम
अंगुली को,
मैं पगतल कर लूं धरती को,
हे कुरूक्षेत्र की अमर गूंज ॥

सरस्वती वंदना

माँ सरस्वती उपकार कर,
मेरे कंठ में भर ज्ञान स्वर ।
हर ओर फैला तमघटे,
नव प्रात सा जीवन बने
रख शीश मेरे वरद कर ।
वलबुंध्दि विद्या दान कर
मुझे सत्य सूर्य प्रदान कर
नभ सम मेरे क्षितिज गढ़ ।
तेरे हंस पंख की छाँव दे,
गिरि शिखर चढते पाँव दे,
हर मन में अपना रूपभर ।
ओ धवल वस्त्र की धारिणी,
दुख हरणि आनंद दायिनी,
मैं शरण तेरी स्वीकार कर ।

Tuesday, December 16, 2008

Asha Shrivastava - Bund Bund Pyaar Bhar Ek Kalash Mein Dalkar



Kaviyatri, Vyangakar, Smt. Asha Shrivastava read her Kavita - Rashtriya Ekta - Bund Bund Pyaar Bhar Ek Kalash Mein Dalkar in Goshthi at Raipur Chhattisgarh by Web Media

Thursday, December 11, 2008

Asha Shrivastava - Chunav Jeet Dala To Life Jingalala - 2



English Lecturer, Sahityakar, Vyangakar, Kaviyatri Smt. Asha Shrivastava read Vyanga - Chunav Jeet Dala To Life Jingalala in Gosthi at Raipur Chhattisgarh by Web Media Part 2

Asha Shrivastava - Chunav Jeet Dala To Life Jingalala



English Lecturer, Sahityakar, Vyangakar, Kaviyatri Smt. Asha Shrivastava read Vyanga - Chunav Jeet Dala To Life Jingalala in Gosthi at Raipur Chhattisgarh by Web Media Part 1

Asha Shrivastava - Maa Saravasti Upkar Kar



English Lecturer, Sahityakar, Vyangakar, Kaviyatri Smt. Asha Shrivastava read Kavita - Maa Sarasvati Upkar Kar in Ghosthi at Raipur Chhattisgarh by Web Media

चुनाव जीत डाला तो लाइफ जिंगालाला

शीर्षक में प्रयुक्त चुनाव शब्द की शल्य चिकित्सा करने से ज्ञात होगा (मुझे तो होता है आपका पता नहीं) कि इसके पहले अक्षर 'चु' 'चुराने' क्रिया का शार्ट फार्म है। और 'ना' गैर फायदेमंद लोगो को नकारने के लिए काम में आने वाला शब्द और 'व' शब्द विषिष्ट का शार्टफार्म है। इस तरह इसका पूरा अर्थ खुद चोरी करो, अपने विरोधियों के हर काम को 'ना' कहो और यही विषिष्ट होने का लाभ है। शीर्षक का दूसरा शब्द है 'जिंगालाला'। अगर इसे आप शब्दकोष में तलाषेंगे तो ढूँढ़ते रह जायेंगे। इसका अर्थ आवाज से उत्पन्न शब्दों की तरह समझना पड़ता है जैसे 'टपटप' शब्द से एक एक बूँद के टपकने का आभास होता है और 'खटखट' से ठोके जाने का। इस हिसाब से जिंगालाला शब्द का अर्थ अत्यंत प्रसन्नता में उच्चारा गया शब्द जहन में आता है। याने चुनाव जीत जाने से जिंदगी में खुषी का प्याला लबालब भर जाता है।

बात की शुरूआत चुनाव के व्यस्ततम समय से की जाना चाहिए। चुनाव के वक्त उम्मीदवार के असापास अत्यंत मव्य वातावरण रहता है। वह एकाएक फोकस में आ जाता है। सारे चुनाव क्षेत्र में उसके झंडे, डंडे का शोर रहता है उसी के नाम के नारे, कट आउट्स, बैनर, नजर आने लगते है ठीक वैसे ही जैसे शादी ब्याह की जगह एकाएक वीडियो कैमरा किसी एक को फोकस करे और वह व्यक्ति उस तमाम भीड़ में ''मिनट भर के लिए ही सही'' एकाएक आकर्षण का केन्द्र बन जाये। चुनाव के दौरान इस होने वाले फोकस के वक्त उम्मीदवार अंदर से यह जानता है कि यह सब उसकी तथा उसके कुछ 'विषिष्ट' सहयोगियों की-जेब का कमाल है। आदमी का स्वभाव है वह मन-ही-मन चाहता है उसके नाम का डंका बजता रहे फिर भले ही वह डंका बजवाने लायक हो या न हो। झूठ के ऊपर एक पतली सी भले की परत के साथ समाज में परोसा जाना आम बातें है, और यह सहज स्वीकार्य भी है सच सब जानते है पर जुबां चुप रहती है। इस प्रकार उम्मीदवार के नाम का सिक्का (भले ही वह कागज का नोट हो) चलता है। यह चलन पुराना है फिरोजषाह नामक बादषाह पूर्व में चमड़े का सिक्का चला चुका है। पर चुनाव के पहले उम्मीदवार के दिमाग में एक किड़ा रेंगता रहता है पता नहीं परिणाम क्या हो। हारने पर इन्हीं गलियों चोराहों विरोधी ढोल बजा-बजा कर मेरी हार की खिल्ली उड़ाएंगे। कुछ विरोधी तो चुनाव के पहले ''गली गली में शोर है फलां फलां चोर है'' के नारे लगवा देते हैं।

न मालूम ऊपर वाले ने मेरे विरोधीयों को पैदा ही क्यों किया मैं तो काफी था मुझसे ही मजे से काम चलाया जा सकता था। मेरी बड़ी इच्छा की एक बार मेरा ऊपर वाले से सामना हो और मैं यह प्रष्न पुछ सकूँ मुझे तो लगता है ये विरोधी तत्व धारी जीव ऊपर वाले के खिलाफ भी झंडे फहरा रहे थे इस लिए ऊपर वाले ने इन्हें नीचे भेज दिया और अब ये मेरे पीछे पड़ गये हैं। यने भगवान ने बला मेरे पीछे छोड़ दी। भगवान आखिर भगवान है सर्वशक्तिमान हैं जिसने मेरे जैसे काइयों को पैदा किया वह खुद कितना बड़ा कांइयां होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

अब तो होगया है वोंटो की अटूट शक्ति के, उपहारों, सुरा वितरण की अचूक सेवा पर पुरा विष्वास है। मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि जीतूँगा तो मैं ही मेरा तो अनुभव है उपर्युक्त प्रकृति वाले ही चुनाव जीतते हैं। पढ़े लिखे सभ्य समझे जाने वाले तो चुनाव के कीचड़ भी लगवा लेते हैं और उसे धों पोंछ कर साफ-सुथरे अच्दे भले 'मदर इंडिया' फिल्म की नायिका नर्गिस की तरह हो जाते है। वह तो सिर्फ फिल्म की शूटिंग के दौरान मिट्टी पोते रहती थी बाद में झका-झक सफेद कपड़े पहन लेती थी। हम भी चुनाव के बाद सफेद साड़ी वाले नर्गिस बन जाते हैं।

लो जी चुनाव परिणाम भी आ गया और वो बिलकुल वैसा ही था जैसा मैंने सोचा था। मैं चुनाव परिणाम देखकर गुनगुनाने लगता हूँ चाँदसी महबूबा होगी मेरी मैंने ऐसा सोचा था। अब मुझे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की गुडबुक्स में आना है और अच्छा मलाईदार विभाग हथियाना है। सब जानते हैं जितना ऊँचा मंत्री का कद व पद उतना बड़ा उसका मलाई का कटोरा। मेरे सिक्रेट केमरे में कई साईज के मलाई के कटोरा मैंने इकट्ठे कर रखें हैं अपने नेता को समर्पित करने के लिए। अरे ‘किसी-किसी नेता को पूरे तबेले के भैंसो के दूध की मलाई भी कम पड़ जाती है’। एसी बात बता दूँ मैंने मलाई शब्द इजाद किया है मक्खन की जगह काम में लाने को। मक्खन शब्द लोग पहचानते हैं यह चापलूसी करने वालों के लिए उपयोग में आता है। मैं मक्खन की जगह मलाई शब्द इस्तेमाल करता हँ। बड़ा नेता का एक इंच का मुँह सुरसा के भयानक बड़े मुँह से भी बड़ा होता है ऐसे मुँह पर ढ़क्कन भी तो बड़ा ही लगेगा। पर मैं जानता हूँ जैसे सिमसिम के मंत्र वाला चमत्कार होगा तुरंत स्वर्ग सीढ़ि प्रगट हो जायेगी समूचा इ्रद्रलोक मेरे कदमों में होगा। अफसर अप्सराओं की तरह मेरे इषारों पर नाचेंगे मुझे रिझाएंगे।

मैं पहले अपने लिए एक महलनुमा घर बनवाऊँगी जिसमें दरबारे आम और दरबारे खास की विशेष व्यवस्था रहेगी एक पुरानी सायकल को तरसने वाली जिंदगी के माथे पर हवाई टिकट जड़ दूँगा। जीत की खुषी का कटोरा छलका जा रहा है और उछलकर खुषी बाहर आ रही है कार बंगला बैंक बैलेंस के रूप में। जी कर रहा है हे भगवान मुझे लगे हाथ आषीर्वाद दे डालूँ दूधो नहाओं पूतों फूलों। मेरी सफलता से मेरे दुष्मन की छोड़ो रिष्तेदारों, दोस्तों तक को एनाकोंडा डस गया। मेरे मन में इनके लिए यह शेर बार-बार चक्कर लगा रहा है।
दूर रहे तो जुदाई से हाय हाय करें
मिले तो कमबक्त जहर उगलने लगें,
अजब सुलगती लकड़ियाँ हैं हितैषी,
जो अलग रहे तो धुंआ दें मिलें तो जलने लगें।

अब मैं अपना स्वर्ग द्वार बंद करता हूँ और आपके लिए नर्क का द्वार खोलता हूँ। आपका भला ऊपरवाला करेगा। मुझसे ज्यादा सक्षम हाथों में सौंपता हूँ।

आशा श्रीवास्‍तव
आर. डी. ए. कालोनी,
प्लाट नं 43
टिकरापारा, रायपुर (छ.ग.) 492001
0771-2273934
094076-24988

Friday, December 5, 2008

शिकार बनाम चुनाव

शिकार पुराना शगल है। वैसे अभी भी नवाबों के खानदान वाले (सैफ, नवाब पटौदी) शिकार के बुखार से यदाकदा पीड़ित हो जाते हैं। एक अकेला आदमी जंगल में जाकर शिकार नहीं करता । इसके लिए अमला लगता है। ठीक इसी तरह चुनाव होता है। मेरे कहने की तात्पर्य यह है कि चुनाव ठीक शिकार की तर्ज पर लड़ा जाता है। चुनाव भी एक अकेला नहीं लड़ता । इसके लिए समर्थकों की ज़रूरत होती है। जैसे पहले शिकार करने की ट्रेनिंग लेना पड़ता है उसके गूुर सीखना होता है। ठीक इसी तरह चुनाव जीतने के फार्मूले जानना ज़रूरी होता है। शिकारी अपने पिता से या कभी -कभी अन्य किसी मित्र या संबंधी से इसे सीखता है। चुनाव का उम्मीदवार भी कभी अपने पिता और कभी किसी अन्य से इसकी ट्रेनिंग लेता है। याने यह ट्रेनिंग कभी - कभी वंशानुगत और कभी - कभी वातावरण से ली जाती है। शिकारी का बेटा अपने घर में ऐसे ही वातावरण में पलता है बढ़ता है। नेता का बेटा भी बचपन से नेतागिरी के गुण (गुर) घर में धीरे - धीरे कर अपने पिता, चाचा, दादा इत्यादि से सीखता है।

जैसे शिकार के लिए निशाना साधना आना एकदम ज़रूरी है। इसी प्रकार नेतागिरी में वोटर को सूंधना उसे भलीभांति जानना ज़रूरी होता है। वैसे निशाना तो फौजी या निशानेबाजीं के खिलाड़ी भी लगाते है। जैसे (अभिनव बिंद्रा) पर शिकारी केवल निशाना ही नहीं बल्कि घात लगाना भी सीखता है और यह उसके लिए बेहद ज़रूरी भी होता है। ऐसे ही नेतागिरी सीखने वाले को मतदाता को काबू में करने की कला (घात लगाने की क्रिया) सीखना पड़ता है। मतदाता किस धर्म या जाति का है उसकी रूचियाँ क्या हैं उसकी जरूरतें, कमज़ोरियाँ क्या हैं आदि की जानकारी इकठ्ठा करना होती है। शिकारी भी जानवर की गतिविधियों को देखता परखता है। शिकार कहाँ - कहाँ जाता है। किस जंगल में रहता है कहाँ पानी पीता है इत्यादि की जानकारी होने पर ही शिकार कर पाना उसके लिए संभव होता है। निशानेबाज़ी सीखने वाले खिलाड़ी और शिकारी में अंतर है। निशानेबाज़ी का खिलाड़ी एक लक्ष्य सामने रखकर निशाना साधता है उसे लक्ष्य के बारे में जानने का विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता । निशानेबाज़ और शिकारी में वहीं अंतर होता है जो धतूरे के फूल और किसी अन्य साधारण फूल में होता है। वैसे फूल तो दोनों ही होते हैं पर इनकी तासीर में भारी अंतर होता है। नेता मतदाता के बारे में पूरी जानकारी इकठ्ठी करने के बाद ही अपना चुनाव क्षेत्र चुनता है।

शिकारी मचान बनाना, हांके के लिए जरूरी सामान, हांके वाले, मशाल, बंदूक इत्यादि की जानकारी ही नहीं बल्कि इन्हें कैसे इकठ्ठा किया जाय सीखता है। नेता भी पोस्टर, बैनर, कटआउट बनाना, लगाना, जुलूस, सभाओं का आयोजन, मंच बनाना, लाउडस्पीकर, भाषण, नारे लिखने वाले, नारे चिल्लाने वाले बच्चे इत्यादि का इंतजाम करता है और किसी पढ़े लिखे के निर्देशन में पर्चा (उम्मीदवारी का) भरता क्योंकि वह कानून नहीं जानता । उसे ठीक से पर्चा भरना नहीं आता ऐसी हालत में पर्चे के खारिज होने का खतरा रहता है अगर पर्चा खारिज हो गया तो सब धरा का धरा रह जायेगा। इन सबके लिए धन की व्यवस्था करना एक राज का विषय है अब सभी कुछ तो बताना जरूरी नहीं है बस सब देखो और समझो पर छोड़ना पड़ता है। नेता ठीक शिकारी के समान अपने चुनाव क्षेत्र को चुनता है जैसे शिकारी शिकार के लिए जंगल का चुनाव करता है।

शिकारी और नेता अपने 'शिकार' से उसी समय तक सजग व सतर्क रहते हैं जब तक वे शिकार नहीं कर लेते याने शिकारी जब तक जानवर मार नहीं लेता और नेता चुनाव नहीं जीत लेता । उसके बाद तो दोनों की पौबारा शिकारी शिकार का मांस खाता है खिलाता है उसके चमड़े व चर्बी को बेचता है। नेता अपने वोटर को अब ख़ास नहीं आम आदमी याने अदना कमजोर प्राणी समझने लगता है। मतदाता चुनाव के पहले तक ख़ास बाद में आम आदमी में बदल जाता है। आम बड़े मजे का फल है इसका रस पियो, गुठली बेचो, आम पापड़ बनाओ और अंत में फिर से गुठली बों दो और फिर अगली फसल के फायदे काटो आम आदमी भी चुनाव के बाद 'आम' हो जाता है। इसी प्रकार उसे चूसा, बोया और बेचा और बोया जाता है।

बस शिकार और मतदाता में एक बड़ा फर्क है। शिकार तो गोली खाकर मर जाता है पर मतदाता वोट देकर केवल निस्तेज हो जाता है। पर उसके फिर से शक्ति ग्रहण करने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। जनशक्ति कभी खत्म नहीं होती। भूखा बेबस शक्तिहीन आदमी कभी भी किसी क्रांति का जन्मदाता बन सकता है। इतिहास कहता है घुसे पेट, निकली हुई ऑंखों वाले कंकाल सदृष्य मानव ढांचो से ही क्रांति का जन्म होता है।

नेताओं उस समय तक तुम राजनीति की उस नदी पर पुल बनाते रहो जिसका कोई अस्तित्व नहीं है पर जिस दिन जन जागेगा तुम्हें बचने को जगह नहीं मिलेगी।

श्रीमती आशा श्रीवास्तव
आर.डी.ए. कॉलोनी
टिकरापारा, रायपुर
प्लाट नं. : 45
फोन नं. : 0771-2273934
मो.नं. : 094076-24988

''दो ऋण बराबर एक धन''

उपरोक्त शीर्षक देखकर यह मत सोचिए कि मैं गणित की चर्चा करने वाली हूँ या मेरा इरादा गणित सिखाने का है। मैं तो यही कहना चाहती हूँ कि कभी - कभी ज़िंदगी में भी गणित के फार्मूले के हिसाब से घटनाएँ घटती हुई दिखाई देती हैं। जरा खुलकर चर्चा करने पर ही यह बात स्पष्ट हो पायेगी, यह अद्भुत गणित समझ में आयेगा। राहुल महाजन ठीक वैसा चरित्र है जैसा अक्सर बड़े बाप का बेटा होता है अर्थात समस्त अवगुण संपन्न । बात बिलकुल ठीक भी है। बाप का तो सारा समय धन कमाने में लग जाता है, उसे उसका सुख भोग करने का अवकाश ही नहीं मिलता । उसका बेटा अपने बाप के इस अधूरे काम को पूरा करने का भार उठाता है अर्थात बाप के पैसे को खर्च करने और उसका आनंद लेने का कार्य संपन्न करने का संकल्प सकता है। राहुल महाजन ने भी अपने पिता के ऊपर वर्णित अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया। इसके लिए उसने वाहियात से कहे, समझे जानेवाले कामों की लिस्ट बनाई जैसे ड्रग लेना, शराब, शबाब की शक्कर की चाशनी में डूबना इत्यादि । ये काम वह पूर्ण निष्ठा से करने लगा पर बाहरी दुनिया ! वह उसे गणित का ऋण का चिन्ह समझने लगी !

वह उपर्युक्त वर्णित कार्यो को सिखाने वाले सखा व गुरूओं की संगत में आनंद मार्ग का अध्ययन करने लगा। प्राचीनकाल में विद्यार्थी घर से दूर आश्रम में शिक्षा लेते थे। शिक्षाकाल में वे घर की ज़िम्मेदारियों से दूर रहते थे। राहुल भी इसी तरह अपने परिवार की जिम्मेदारियों को बंद ऑंखों से देखता रहा। पिता की मृत्यु के बाद ड्रग सेवक होने के कारण उसे जेल जाना पड़ा। कुछ समय बाद वह बाहर आया और उसने अपनी एक मित्र से शादी करली पर उसकी ज़िम्मेदारियों से दूर रहने की इतनी आदत हो गई थी कि वह बहुत दिनों गृहस्थाश्रम में टिक नहीं पाया । ड्रग साधक का मन भी साधु के समान होता है वह इस असार संसार में अधिक समय लिप्त नहीं रह सकता । उसके नकारात्मक चरित्र के सकारात्मक होने की सोचना सब्ज़ियों के भाव गिरने जैसा कठिन कहा जा सकता है।

अब मैं दूसरे ऋण ( - ) अर्थात् ऋणात्मक चरित्र की बात करूँगी। मोनिका बेदी का परिदृष्य में अवतरण स्वर्ग से मेनका के उतरने जैसा कहा जा सकता है। बालीवुड किसी स्वर्ग से ज्यादा ही है कम नहीं। बालीवुड में एक ही इंद्र राज नहीं करता वहाँ प्रजातंत्रात्मक तरीके से भी इंद्रासन उपलब्ध नहीं होता वहाँ इंद्र भीड में से उभरता है और सिंहासनारूढ़ होता है। यह ''भए प्रगट कृपाला'' पंक्ति साकार करता सा लगता है। बात इंद्र में अटक गई और मोनिका उर्फ मेनका पीछे छूट गई बॉलीवुड में मोनिका उर्फ मेनका अपना सौंदर्य बिखेरती बड़े पर्दे पर अवतरित हुई। इस मेनका ने वैसे तो किसी को अपने सौंदर्य जाल में फसाने की स्वत: प्रयास नहीं किया पर सौंदर्य में फेबीकाल होता है और अबू सलेम विश्वामित्र की तरह उसमें चिपक गए और इस तरह मेनका अबू के हरम की शोभा बन गई । अबू सलेम ऋषि विश्वामित्र नहीं बल्कि एक डॉन, अंडरवर्ल्ड का किंग था पर जहाँ तक सौंदर्य से प्रभावित होने और प्रेम का संबंध है वहाँ दोनों में कोई अंतर नहीं कहा जा सकता।

मैंने बचपन में सुना था चुड़ैल अपने हाथ लंबे कर लेती है और दूर की चीज़ तक पकड़ लेती है। बड़े होकर मैंने जाना कानून के हाथ लंबे होते है! मेनका (मोनिका) व अबू के मामले में कानून ने अपने हाथ इतने लंबे कर लिए कि दूर के देश से दोनों को पकड़कर उन्हें जेल में बंद कर दिया। इसके बाद बेचारी मेनका जेल और कचहरी के बीच बहुत लंबे समय तक भांवर घूमती रही । प्रेम के जेट में बैठ सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री का घर पा गई और मेनका अबू का हरम और कचहरी के चक्कर । उमराव जान फिल्म में भी घर से भगाकर लाई गई दो लड़कियों में से एक को कोठा मिला दूसरी को नवाब की कोठी, यह तो भाग्य का चक्कर है। याने मेनका इस लेख की हेडिंग का दूसरा ऋण ( - ) बन गई।

इसी बीच टी व्ही पर 'एस बॉस' सीरियल शुरू हुआ जिसमें कहीं की 'इंट कहीं का रोड़ा जैसे चरित्रों को लाकर भानुमति का कुनबा याने यस बॉस के किरदार 3 महीने के लिए एक मकान में रख दिए गए । वहीं मेनका + महाजन का परिचय स्थल सिध्द हुआ। वहीं ये दोनों ऋणात्मक चरित्र पासपास आने लगे। अंग्रेजी कहावत है एक से पंखवाले पक्षी एक साथ उड़ते है। राहुल और मेनका के पंखों में भी समानता होने के कारण वे भी इस कहावत को चरितार्थ करते हुए साथ - साथ उड़ने लगे।

अब जानना यह है कि, ये दो ऋणों का परिणाम धनात्मक कैसे हो गया । यह बात बेहद दिलचस्प है। मेनका अबू सलेम के साथ रहती थी अबू उसे अपनी बीबी मानता था। वैसे उनकी शादी का केवल खुदा गवाह था सो इसे जग जाहिर करना कठिन था क्योंकि खुदा की आदत गवाही देने की नहीं है। इधर मेनका ने राहुल से खुल्लम खुल्ला मेल मिलाप बढ़ा लिया और शादी करने के संकेत देने आरंभ कर दिए । सलेम इस पर आग बबूला हो उठा और उसने मीडिया को बयान दिया कि मेनका उसकी बीवी है और वह वगैर तलाक लिए राहुल से शादी नहीं कर सकती। इस पर मेनका ने पलटवार करते हुए कहना शुरू किया कि उसकी सलेम से कभी शादी हुई ही नहीं थी।

सलेम इसके लिए तैयार नहीं था। वह मेनका के प्रेम की चाशनी में रसगुल्ले सा आकंठ डूबा था उसे मेनका के बयान से इतना धक्का लगा कि वह फूट - फूट कर रोने लगा उसका दिल टूट ही नहीं गया बल्कि उसका पावडर बन गया । वह जेल के अधिकारियो, पहरेदारों के सामने घंटों रोता और अपने डॉन वाले नेटवर्क की बात पूरी तरह भूल गया अब वह पहले जैसा जुल्म पसंद नहीं रह गया था बल्कि एक हारे हुए प्रेमी की तरह व्यवहार करने लगा । अभी हाल में मैंने अखबारों में पढ़ा कि वह ठीक से खाना भी नहीं खाता और उसने अपने आपको अकेला भी कर लिया। सलेम की इस हालत ने दो ऋणों के धन बनने में मद्द की। जिस अंडरवर्ल्ड के ख़तरनाक डॉन से पुलिस, सी.बी.आई. परेशान थी जिसका नेटवर्क वह जेल से भी चला रहा था वह मेनका के शब्दों से टूट कर बिखर गया। देश के लिए यह भारी राहत व खुशी की बात है। मेरा तो मानना है भारत सरकार को मेनका को परमवीर चक्र देना चाहिए । इस अद्भूत ढंग से सलेम का हृदय परिवर्तन दो ऋणों के धनात्मक परिणाम के रूप में सामने आया । अंग्रेजी में कहावत है कभी - कभी सत्य कल्पना से भी परे होता है।

श्रीमती आशा श्रीवास्तव
आर.डी.ए. कॉलोनी
टिकरापारा, रायपुर
प्लाट नं. : 45
फोन नं. : 0771-2273934
मो.नं. : 094076-24988

''राज ठोक रे''

ऐसा लगता है राज से कोई राक्षस कह रहा है ठोक रे, बिना सोचे समझे ठोकता जा। दांए बांए मत देख बस ऑंख बंद करके ठोकता जा। यह देखने की कतई ज़रूरत नहीं है कि सामने कौन है बस इतना याद रख मराठों भर को छोड़ना है उनके नाम की आड़ लेकर मेरी बात मानकर ठोकता जा। बड़ा मजा आता है मारकाट में हाथपैर टूटे खून बहते लोगों को देखकर जो आनंद आता है उसका सिर्फ महसूस ही किया जा सकाता बयान नहीं । शायद इसी कारण राज ठाकरे ने मारधाड़ शुरू कर दी है। उसने राजदंड की प्राप्ति के पहले ही डंडे को धारण कर लिया है। शायद वह सोच रहा हो डंडा भी तो राजदंड का वंशज है और वह उसे राजदंड की प्राप्ति तक पहुँचा दे!

राजनीति का अर्थ ही है जैसे मिले राज वही नीति अपनाना चाहिए। राजनीति में सिध्दांत न्याय व नीति का कोई काम नहीं क्यों कि इनसे 'राज' प्राप्ति कठिन ही नहीं नामुमकिन है। प्रजातंत्र में जनता तो भेड़ बकरी होती है उसे हांक कर ही राज प्राप्ति हो सकती है और हांकने की क्रिया को अंजाम देने के लिए डंडा जरूरी है। हो सकता है 'डंडे' को खुश करके उसके दादाजी (राजदंड) खुश हो जायें और सत्ता हाथ आ जाये। 'राज' भी राज करने का यह दर्शन केवल समझ ही नहीं वरन आत्मसात कर चुके हैं।

''राज ठोक रे'' यह किसी का नाम नहीं बल्कि राज करने या सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने की सीढ़ी है अर्थात् अगर राज करना है या राज पाना है तो ठोकना जरूरी है। हल्ला करना, हल्ला बोलना सत्ताा पाने के मंत्र हैं। चाण्ाक्य साम, दाम, दंड, भेद सभी का इस्तेमाल करता था। अपना काम निकालने के लिए या यों कहें कि ये चारों सत्ता सिंहासन के चार पाए हैं जिससे सत्ता का सिंहासन पाना, बचाए रखना सरल एवं संभव होता है। कोई चाण्क्य ही उपरोक्त चारों को कुशलता पूर्वक काम में ला सकता है पर एक लाठी से हांकना सरल काम है। डंडा और राजदंड का चोर पुलिस का संबंध है। यह एक अजमाया हुआ शार्टकट है। कुछ उभरते नेता इस पर गहरी आस्था रखते हैं और बिना दांए बांए देखे इस पर निष्ठापूर्वक अमल करते हैं। प्रजातंत्र का तो यह सबसे मजबूत पाया है।

प्रजातंत्र में शासन के लिए बहुमत जरूरी होता है। अरस्तु कहता हैं बहुमत मूर्खो का होता है। इस हिसाब से ठोकने के महामंत्र को जपकर ही चलाया जा सकता है। मूर्खो को अपनी बात समझाने या कहें मानवाने के लिए ठोकना सबसे कारगर फार्मूला पाया गया है जिसकी लाठी है भैंस उसी कि मानी जाती है। तर्कशास्त्र का सिध्दांत भी है हाथ टेबिल को छू रहा है और टेबल जमीन को इस प्रकार यह मान लो हाथ टेबल को छू रहा है। इस हिसाब से जिसकी लाठी है भैंस उसी की माना जाना चाहिए।

प्रजातंत्र में जनता गूँगी, बहरी और सोती रहती है इसे जगाने के लिए डंडे की भाषा ही ठीक है। वैसे भी सोते हुए को जगाने के लिए हम उसे हिलाते हैं चिल्लाते हैं कभी - कभी पानी भी उसके मुँह पर मारते हैं। यह तो एक आदमी को जगाने के लिए है पर जब जनसाधारण को जगाना हो तो डंडे की ही जरूरत होती है।

''कहीं जला के राख न कर दे सूरज की तपिश,
आस्मां नींद में है इसके मुँह पर समंदर मारो।''

याने एक आदमी को जगाने के लिए एक चुल्लू पानी लगता है तो जनता को जगाने को समंदर याने डंडे की ही जरूरत होगी।


अब हमें सोचना यह है कि डंडा चलाकर हम अपनी किस बात को समझना चाहते हैं। किसी भी राजप्राप्ति के सिध्दांत की दुम ''अपना उल्लू'' पकड़े रहता है। सिध्दांत तो ऊपर जसा दिसते तसा नसते अर्थात जैसा दिखता है वैसा सच में होता नहीं। राज ठोकरे नए - नए नेता बने हैं या बनना चाहते हैं इसलिए अपनी उम्मीदवारी का एलान वे डंडे की भाषा से कर रहे हैं ताकि कोई सोने न पाए और जो सोए हैं वे जाग जायें। वे सत्ता पाना चाहते हैं यह भाषणबाज़ी से पाने में काफी समय लगेगा और क्या भरोसा कोई सुनता है या नहीं । अत: एक डंडा जमाओ और आदमी (जो डंडा खा चुका है) आपकी बात तुरंत समझ जायेगा। बचपन में हमने अपने गुरूजी से सुना था छड़ी पड़े छमाछम विद्या आए धमाधम। हमें विद्या ऐसे ही आई है।

कभी - कभी बिना वाजिब मुद्दे के राजनीति के अखाड़े में खड़ा होना आसान नहीं होता और गैरवाज़िब मुद्दे को मनवाने के लिए आचार्य डंडा प्रसाद जी को सर्वश्रेष्ठ गुरू सर्वसम्मति से माना जाता है। बाकि पार्टियाँ पहले से ही कुछ मुद्दों की पूँछ चुनाव की बैतरणी पार करने के लिए पकड़े खड़ी हैं करीब - करीब सभी सतही तौर पर ठीक ठाक लगने वाले मुद्दे खत्म हो चुके हैं भाजपा हिंदुत्व की कांग्रेस सर्वधर्म समानता समाजवादी पार्टी समाजवाद की और बाकी पार्टियों राष्ट्रीयता, धर्मनिर्पेक्षता, अपने क्षेत्रीय मुद्दों को अपने बैनरों में चस्पा कर चुकी है। अब ऐसी हालत में एक नया वाजिब सा दिखने वाला मुद्दा ढूँढना कठिन है सो राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र का मुद्दा चलाने की थोड़ी बहुत गुंजाइश है। राज शायद पूरे राष्ट्र को धृतराष्ट्र समझ रहे हैं। उनके गुंडों की भीड़ में उन्हें इंच भर आगे का नहीं दिख रहा। 'महाराष्ट्र मराठों के लिए' मुद्दा उनके लिए शेर की सवारी है जिस पर एक बार चढ़ा तो जा सकता है पर उससे उतरा नहीं जा सकता वरना शेर खा जायेगा।

सभी समय एकसा नहीं होता । देश के बाकी अवसर वादी नेता राज को भला एक नया मुद्दा खड़ा करने देंगे ? अपना एक और प्रतिद्वंदी बढ़ने देंगे वे सब मिलकर राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र नहीं है समझाएंगे। इसमें दम भी है आखिर प्रजातंत्र में बहुमत की चलती है और बहुमत राज के खिलाफ है। राज की खून खराबे की नीति कहीं उन्ही ही भारी न पडे। राज ठोक रे की जगह अगर 'राज को ठोकरे' आवाज बुलंद हुई तो राज के आज, कल, परसों सभी खतरे में पड़ जायेंगे।

श्रीमती आशा श्रीवास्तव
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